Sunday, 21 July 2013

"मैने कब सोचा था "

मैने कब सोचा था कि ज़िन्दगी का सफ़र इस 
मुकाम सेगुजरेगा 

जहाँ .....
सिर्फ मैं ही होऊँगी और 
अजनबी सा मन्ज़र होगा!

ये हैरान और परेशान करने वाला सच 
जब तुम्हारी  जगह सिर्फ अकेलापन ,
सूनापन होगा !

कब सोचा था मैने
कि मेरे रास्ते ज़मीन से नहीं 
समंदर से गुज़रेंगे 
जहाँ ना कोई मील पत्थर होगा 
ना किसी अपने से दरख्त की छाँव ,
ना कोई कन्धा होगा !

और क़दमों के नीचे 
समन्दर की गहराई 
और मज़िल की पैमाइश के लिए ,
दूर दूर तक सिर्फ क्षितिज होगा !

No comments:

Post a Comment