Sunday, 17 November 2013



दोस्ती  आशिक़ी  इन  हदों  में  हम  खुद को  क्यों  क़ैद  करें
ख़ुशनसीबी  से मिले  हैं
जो  दो पल, आ  बैठ  पास  जरा, कोई  बात  करें
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क्या है ये जो हर पल हर मौसम रिसता है ,
कोई नासूर है शायद पर ज़ख्म नहीं दिखता है।

                   कितने पुलों के नीचे से गुज़र कर पानी आया है तेरे शहर में
                   ग़ौर से देख ज़रा ,हर शहर का इसमें रंग दिखता है।

तुझे क्या हुआ ऐ आसमां तू छमछम बरसने लगा ,
मुझे लगा था हर शहर में तूं इक सा दिखता है।

                    तेरे मेरे बीच आज जुदाई का रिश्ता है ,
                    क्यूँ लगता है पर मुझे ,मेरे गिले शिक़वे तूं आज भी सुनता है।
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