दोस्ती आशिक़ी इन हदों में हम खुद को क्यों क़ैद करें
ख़ुशनसीबी से मिले हैं
जो दो पल, आ बैठ पास जरा, कोई बात करें
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क्या है ये जो हर पल हर मौसम रिसता है ,
कोई नासूर है शायद पर ज़ख्म नहीं दिखता है।
कितने पुलों के नीचे से गुज़र कर पानी आया है तेरे शहर में
ग़ौर से देख ज़रा ,हर शहर का इसमें रंग दिखता है।
तुझे क्या हुआ ऐ आसमां तू छमछम बरसने लगा ,
मुझे लगा था हर शहर में तूं इक सा दिखता है।
तेरे मेरे बीच आज जुदाई का रिश्ता है ,
क्यूँ लगता है पर मुझे ,मेरे गिले शिक़वे तूं आज भी सुनता है।
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